घर हमारे बारे में विभाग मवेशी और डेयरी विकास

    मवेशी और डेयरी विकास

    गोपशु प्रभाग

    भारत में बोवाईन प्रजनन सेक्ट र का सिंहावलोकन

    पशुधन क्षेत्र अधिक समावेशी और स्था यी कृषि प्रणाली को सुनिश्चित करने हेतु एक महत्वदपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभरा है। राष्ट्री य नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) से साक्ष्यर के रूप में 70वें चक्र सर्वेक्षण से पता चलता है कि बहुत छोटे भूखंडों (0.01 हैक्टेनयर से कम) वाले कृषि परिवारों के पांचवे भाग से अधिक (23%) परिवारों ने पशुधन को अपनी आय का मुख्यर स्रोत बताया है। कुछ संख्याे में गोपशुओं के साथ खेती करने वाले परिवार अत्योधिक खराब मौसम की स्थिति के कारण पैदा होने वाली विपदा का बेहतर रूप से सामना करने में सक्षम होते हैं।

    बढ़ रही जनसंख्याह, बदलती जीवनशैली, शहरीकरण के विस्ता र और त्वशरित जलवायु परिवर्तनों से बोवाईन प्रजनन प्रणालियों में नई चुनौतियां पैदा हो रही हैं। विगत में पर्याप्तऔ आहार उपलब्धरता चुनौती थी परन्तुप अब यह स्वानस्य्या वर्धन के लिए विशेषरूप से प्रजनन हेतु स्वातस्य्िव को बढ़ावा देने के लिए अनिवार्य पोषकतत्वल मुहैया कराता है और भविष्यप में चुनौती पशु आनुवांशिक पार्श्वर रूपरेखा (प्रोफाइल) और उत्पालदकता के आधार पर इष्टथतम पोषकतत्वि उपलब्धय कराना होगी। भाग्यौवश चुनौतियों के साथ-साथ विज्ञान में होने वाली प्रगति से इन चुनौतियों से निपटने के लिए नए रास्तेय निकल रहे हैं।

    इसके अलावा, पशुधन की जैवविविधता, जोकि दीर्घकालिक उत्पानदकता बनाए रखने के लिए महत्वअपूर्ण है, भी खतरे में है। आनुवांशिक रूप से एक समान प्रणालियां अत्यरधिक खराब मौसम की स्थिति में पैदा होने वाले रोगों और रोगजनकों जैसे बाह्य आघातों के लिए असुरक्षित हैं। पशुधन क्षेत्र में विदेशी जननद्रव्ये (जर्मप्लासजम) आधारित वर्ण-संकर प्रजनन पर सतत रूप से जोर दिए जाने के कारण बेहतर अनुकूलन क्षमता, रोग-प्रतिरोधकता और आहार प्रगुणता वाली स्व देशी नस्लों की संख्या कम हो रही है। दूध उत्पातदन को बढ़ाने के लिए किए जाने वाले अविवेकपूर्ण प्रयासों के कारण वर्ण-संकर नस्लों की संतानों में अनियंत्रित रक्ता-स्तयर पाए जाने के कारण स्थिति और खराब हो गई है। इस प्रकार भारतीय स्वलदेशी नस्लों का संरक्षण करना और इनकी उत्पाोदकता में सुधार लाना आज के समय की जरूरत है। इस कार्य को पूरा करने के लिए विभाग अब तदनुसार उन्नकत नवीनतम प्रजनन प्रौद्योगिकी विकास क्रमों का प्रयोग करके 100% कृत्रिम गर्भाधान कवरेज पर जोर दे रहा है।

    इस संदर्भ में भारत में 41 स्वशदेशी गोपशु नस्लें् और 13 भैंस नस्लेंढ होने पर एक व्याोपक जैव विविधता विद्यमान है जो संबंधित स्था्नीय वातावरण में विशिष्टल प्रयोजनों के लिए उनकी उपयुक्त ता के संबंध में पिछले सौ वर्षों से जीवित बनी हुई है। इस प्रकार विभाग की कार्यनीति समग्र उपलब्धत नस्ला किस्मोंप में से चयनित नस्लोंई (अर्थात् उच्च दूध उत्पा दकता के लिए गिर नस्ल ) से दूध की औसतन उत्पालदकता प्रति स्वोदेशी पशु प्रतिदिन 4.85 किलो के वर्तमान स्तउर से बढ़ाकर 6.77 किलोग्राम प्रतिदिन करना है।

    19वीं पशुधन संगणना के अनुसार दूध देने वाले पशुओं की संख्यान 88 मिलियन है जिनका रिकार्ड वार्षिक आधार पर भी अनुपलब्धस है। प्रजनन की अवस्था में पशुओं, उनकी उत्पानदकता, उपचार और टीकाकरण के बारे में रिकार्ड भी राज्या पशुपालन विभागों द्वारा उचित रूप से नहीं रखा जाता है। यह इसलिए है कि उपर्युक्त् पहलुओं के संबंध में रिकार्ड रखने की पद्ति प्राथमिकता निर्धारित न होने के कारण अभी तक सम्पूपर्ण रूप में तैयार नहीं की गई है। पशु पहचान और पशुओं का पता लगाने की क्षमता में कमी, सैनिटरी और फाइटो सैनिटरी स्थितियों को पूरा करने में असमर्थता जैसी बाधाओं को भी इस संबंध में दूर करने की आवश्यंकता है।

    इस संदर्भ में एक पहल नामत: “ई-पशुहाट” बोवाईन जननद्रव्य के लिए ई-मार्केट पोर्टल, आरंभ किया गया है जो ई-मार्किट के जरिए बिक्री किए गए जननद्रव्यब की पहचान करने और पता लगाने, प्रजनकों, राज्य एजेन्सियों और हितधारकों को संयोजित करने के साथ-साथ उच्चप गुणवत्ताबपूर्ण जननद्रव्यई की उपलब्धजता के संबंध में वास्तकविक समय संबंधी डाटा उपलब्ध् कराता है।

    लिंग अनुपात को विनियमित करने तथा एक लिंग के तहत बड़ी संख्यात बच्चे‍ पैदा करने हेतु वीर्य का सेक्सण निर्धारण करने जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकियों का प्रयोग किया जा रहा है। डेयरी उद्योग में विकसित देशों में दूध उत्पा्दन और डेयरी फार्मिंग में लाभप्रदता बढ़ाने हेतु अधिक संख्याव में जेनेटिक मेरिट हैपर्स पैदा करने हेतु किसानों को मादा सेक्से सुनिश्चित किया गया वीर्य उपलब्धि कराया जाता है। निकट भविष्यर में प्रारंभिक चरणों में लिंग सुनिश्चित किए गए वीर्य संबंधी प्रौद्योगिकी को साहीवाल, हरियाणा, रेड सिन्धी , राठी और गिर जैसी स्वयदेशी नस्लों के लिए मानकीकृत किया जाएगा।

    इसके अलावा, स्वरदेशी नस्लों के लिए राष्ट्रीकय बोवाईन जीनोमिक्सक केन्द्रन एनबीजीसी-आईबी) स्थापपित करने हेतु एक पहल आरंभ की गई है। एनबीजीसी-आईबी अत्य्धिक सुनिश्चित जीन आधारित प्रौद्योगिकी का प्रयोग करके मूल्यईवान स्वलदेशी पशु संसाधनों के सुव्यकवस्थित तथा तेज गति से सुधार के लिए मार्ग प्रशस्तू होगा। इन सभी कदमों से भारत लगभग 70 मिलियन कृषि समुदाय को जीविका और सुरक्षा के संबंध में और देश को पौषणिक सुरक्षा मुहैया कराने के लिए एक दीर्घकालिक टिकाऊ समाधान उपलब्धप होगा।


    दूध उत्पातदक

    वर्ष 1998 से विश्व के दूध उत्पांदक देशों में भारत प्रथम स्थाबन पर है और यहां पर विश्वन की सबसे अधिक बोवाईन संख्या् मौजूद है। वर्ष 1950-51 से लेकर वर्ष 2017-18 तक की अवधि के दौरान भारत में दूध उत्पाादन 17 मिलियन टन से बढ़कर 176.4 मिलियन टन हो गया है जबकि इसकी तुलना में वर्ष 2016-17 के दौरान दूध उत्पा दन 165.4 मिलियन टन था। इस प्रकार 6.65% वृद्धि रिकार्ड की गई है। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) ने विश्वप दूध उत्पानदन में 1.46% की वृद्धि सूचित की है जोकि वर्ष 2016 में 800.2 मिलियन टन से बढ़कर वर्ष 2017 में 811.9 (अनुमानित) मिलियन हो गई है। देश में प्रतिव्यमक्ति दूध की उपलब्ध्ता जो वर्ष 1950-51 में 130 ग्राम प्रतिदिन थी जो वर्ष 2017-18 में बढ़कर 374 ग्राम प्रतिदिन हो गई है। इसकी तुलना में विश्व में वर्ष 2017 के दौरान अनुमानित औसतन खपत 294 ग्राम थी। इससे हमारी बढ़ रही जनसंख्यान के लिए दूध और दूध से बने उत्पानदों की उपलब्ध ता में सतत वृद्धि बनी हुई है।

    डेयरी उद्योग लाखों ग्रामीण परिवारों के लिए आय का महत्व पूर्ण अनुपूरक स्रोत बन गया है और रोजगार मुहैया कराने तथा आय सृजन के अवसर उपलब्धह कराने, विशेष रूप से सीमान्त6 और महिला किसानों के लिए रोजगार मुहैया कराने और आय सृजन के अवसर उपलब्धप कराने में अत्याधिक महत्वोपूर्ण भूमिका अदा करता है। अधिकांश दूध छोटे, सीमान्तय किसानों और भूमिहीन श्रमिकों द्वारा पाले गए पशुओं से प्राप्तत होता है। भारत में कुल दूध उत्पामदन में से लगभग 48% दूध का या तो उत्पा दक स्तार पर ही उपभोग कर लिया जाता है या ग्रामीण क्षेत्र में दूध का उत्पाभदन न करने वालों को बेच दिया जाता है। शेष 52% दूध विपणनीय अधिशेष शहरी क्षेत्रों में उपभोक्ता ओं को बिक्री के लिए उपलब्धप होता है। विपणनीय अधिशेष में से लगभग 40% दूध की बिक्री संगठित क्षेत्र (अर्थात् 20% सहकारिताओं द्वारा और 20% निजी डेयरियों द्वारा) द्वारा की जाती है और शेष 60% दूध की बिक्री असंगठित क्षेत्र द्वारा की जाती है।

    लगभग 16.6 मिलियन किसानों को मार्च, 2018 तक लगभग 1,85,903 गांव स्त रीय डेयरी सहकारी समितियों (डीसीएस) के अंतर्गत लाया गया है। विश्व बाजार में मंदी आने के बावजूद और प्रमुख निजी व्या6पारियों द्वारा प्रापण की मात्रा में कमी करने के साथ-साथ डेयरी सहकारिताओं द्वारा बेहतर प्रापण मूल्य मुहैया कराने के कारण डेयरी सहकारिताओं द्वारा दूध संगहण में लगभग 11% की वृद्धि हुई है। डेयरी सहकारिताओं द्वारा वर्ष 2017-18 के दौरान दैनिक औसत आधार पर लगभग 475.6 लाख किलोग्राम प्रतिदिन (एलकेजीपीडी) दूध प्राप्ति किया गया है जबकि इसकी तुलना में वर्ष 2016-17 के दौरान दूध की प्राप्ति 428.7 लाख किलोग्राम प्रतिदिन थी। वर्ष 2017-18 के दौरान द्रव दूध की बिक्री 6% की वृद्धि दर्ज कराते हुए 349.6 लाख लीटर प्रतिदिन (एलएलपीडी) तक पहुँच गयी है। इसकी तुलना में वर्ष 2016-17 के दौरान 331 एलएलपीडी दूध का विपणन किया गया था। डेयरी सहकारी समितियों की महिला सदस्यों को नेतृत्वा भूमिकाएं अदा करने हेतु प्रोत्सा्हित किया जा रहा है। 31.3.2018 की स्थिति के अनुसार देश भर में डेयरी सहकारिताओं में महिलाओं की कुल संख्याह 32,092 महिला डेयरी सहकारी समितियों में 4.9 मिलियन थी जो कि कुल किसानों का 29.5% बैठती है।

    भारत सरकार गुणवत्तानपूर्ण दूध के उत्पािदन और दूध से बने उत्पािदों के प्रापण, प्रसंस्क5रण और विपणन के लिए आधारभूत संरचना को निम्न्लिखित डेयरी विकास योजनाओं के जरिए सुदृढ़ बनाने हेतु प्रयास कर रही है:

  • राष्ट्री य डेयरी विकास कार्यक्रम (एनपीडीडी)
  • राष्ट्री य डेयरी योजना(चरण-I)
  • डेयरी उद्यमिता विकास योजना (डीईडीएस)
  • डेयरी सहकारिताओं को सहायता
  • डेयरी प्रसंस्कओरण और आधारभूत संरचना विकास निधि (डीआईडीएफ)
  • गोपशु विकास फ़ाइल
    1. सिंहाविलोकन (202.98 KB)
    2. बोवाईन सेक्ट‍र आंकड़े (99.17 KB)
    कार्यक्रम और योजनाएं
    कार्यक्रम और योजनाएं
    सम्बयद्ध कार्यालय
    सम्बयद्ध कार्यालय
    प्रशासनिक अनुमोदन
    प्रशासनिक अनुमोदन
    खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ)
    याचिकाकर्ता द्वारा गोपशु प्रभाग की स्थिति के बारे में उठाए गए विभिन्नी मुद्दे
    नीलामी सूचना
    सीएसबीएफ द्वारा नीलामी सूचना
    विविध
    आकांक्षामूलक जिले-नीति आयोग
    सलाहकारी
    बोवाईन प्रजनन
    आयात/निर्यात दिशा-निर्देश
    प्रशासन IV
    दिल्ली दुग्ध योजना
    राष्ट्री य डेयरी विकास बोर्ड
    डेयरी विकास फ़ाइल
    सिंहाविलोकन -
    विजन-2022 – डेयरी विकास के लिए राष्ट्रीिय कार्रवाई योजना (21.85 MB)
    डेयरी उद्यमिता विकास योजना का मूल्यांाकन और प्रभाव अध्यययन – अंग्रेजी (2.83 MB)
    योजनाएं: फ़ाइल
    वे उत्पाडदों पर आयात शुल्कक 30% से 40% करने के संबंध में राजस्वं आदेश (470.9 KB)
    दूध और दूध से बने उत्पा दों के लिए एमईआईएस के तह्त डीजीएफटी की 10% निर्यात सहायिकी (671.36 KB)
    राष्ट्री य डेयरी विकास कार्यक्रम (एनपीडीडी) (91.32 KB)
    राष्ट्री य डेयरी योजना (चरण-I) (एनडीपी-I) (97.89 KB)
    डेयरी उद्यमिता विकास योजना (डीईडीएस) (85.41 KB)
    डेयरी प्रसंस्क रण और आधारिक संरचना विकास निधि (डीआईडीएफ) (75.56 KB)
    राज्य सहकारी डेयरी परिसंघों को सहायता करना (68.16 KB)
    दिल्लीप दुग्ध योजना (डीएमएस) (58.42 KB)
    एनपीबीबी एंड डीडी-अनुबंध (12.36 MB)
    डीईडीएस-21.11.2016 से 31.3.2017 तक की अवधि के दौरान सामान्यी तथा अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी के तहत नए आवेदन प्राप्त7 होने पर निलंबन वापस लेना (561.93 KB)
    डीईडीएस-सामान्यय और अनुसूचित जनजाति(एसटी) श्रेणी के तहत नये आवेदन के प्राप्ता होने पर निलंबन को समाप्ता करने के बारे में राज्योंज को सूचना देना (445.07 KB)
    डेयरी विकास के लिए प्रशासनिक अनुमोदन
    डेयरी विकास के लिए प्रशासनिक अनुमोदन
    एनपीडीडी के संबंध में तिमाही प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुयत करने के लिए प्रपत्र
    दूध प्रशीतन क्षमता
    दूध प्रशीतन क्षमता
    सम्पडर्क ब्यौारा
    सम्पडर्क ब्यौारा